
श्रावणी मेले के पावन अवसर पर पड़ाव संघ, कहलगांव के नेतृत्व में बाबा बासुकीनाथ धाम की ओर प्रस्थान कर रहे लगभग तीन हजार शिवभक्त कांवरियों का जत्था गुरुवार शाम धोरैया प्रखंड मुख्यालय पहुंचा। श्रद्धा और भक्ति से सराबोर माहौल के बीच प्रशासन, जनप्रतिनिधियों तथा स्थानीय समाजसेवियों ने शिवभक्तों का गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान 81 फीट लंबी विशाल कांवर श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी रही।
कांवरियों के स्वागत को लेकर प्रखंड मुख्यालय परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। प्रखंड प्रमुख रंजू देवी, बीडीओ अरविंद कुमार, सीओ अनुज कुमार झा तथा स्थानीय मुखिया अनीता यादव की पहल पर श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, फल, खीर और पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था की गई। वहीं स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगाए गए चिकित्सा शिविर में एएनएम ने जरूरतमंद कांवरियों का स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यक दवाइयां भी वितरित कीं।

धोरैया-सन्हौला और धोरैया-पंजवारा मुख्य मार्ग पर जगह-जगह ग्रामीणों एवं सामाजिक संगठनों ने पुष्पवर्षा कर शिवभक्तों का अभिनंदन किया। कई स्थानों पर जलपान की व्यवस्था भी की गई। प्रखंड मुख्यालय स्थित तालाब परिसर में भव्य गंगा आरती का आयोजन हुआ, जबकि सभा भवन के समीप भक्ति जागरण ने पूरे वातावरण को शिवमय बना दिया।

उत्तरवाहिनी गंगा तट कहलगांव से गंगाजल लेकर बासुकीनाथ धाम की ओर बढ़ रहा यह पारंपरिक जत्था करीब एक शताब्दी से इसी मार्ग का अनुसरण करता आ रहा है। डीजे पर बज रहे भगवान भोलेनाथ के भजनों के बीच श्रद्धालु “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ उत्साहपूर्वक आगे बढ़ते रहे।
इस वर्ष पड़ाव संघ की ओर से 81 फीट, 61 फीट, 51 फीट और 31 फीट लंबी चार विशाल कांवर यात्रा में शामिल की गई हैं। इनमें सबसे बड़ी 81 फीट की कांवर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही।
जानकारी के अनुसार, कहलगांव से गंगाजल लेकर बाबा बासुकीनाथ धाम तक पहुंचने में लगभग छह दिनों का समय लगता है। यात्रा का पहला पड़ाव घोंघा, दूसरा सन्हौला और तीसरा धोरैया निर्धारित है। धोरैया में रात्रि विश्राम के बाद शुक्रवार सुबह शिवभक्त पंजवारा के लिए रवाना हुए। वहां से बौंसी होते हुए सभी श्रद्धालु पैदल यात्रा जारी रखकर बाबा बासुकीनाथ धाम पहुंचेंगे।

श्रावणी मेले को लेकर सुरक्षा व्यवस्था भी पूरी तरह मुस्तैद रही। प्रभारी थानाध्यक्ष आसिफ अख्तर के नेतृत्व में पुलिस बल लगातार गश्त करता रहा, ताकि यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े और पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
